
1.पृष्ठ के किनारे
मैं समय की जिल्द पर
जमे अक्षरों की आहट
जहां आहट ही होना है
हवा पलटती है पन्ने
जैसे कोई अदृश्य पाठक
चुपचाप
पढ़ रहा हो भीतर रची
अधूरी पंक्तियां कवि की
शब्द बह रहे हैं
कागज की नसों में
और अर्थ
अपना चेहरा बनाने में
है व्यस्त।
2.जो लिखा नहीं गया
कुछ न कुछ
रह ही जाता है
उसे फिर जगह मिलती
है हाशिए पर
आ नहीं पाते वे कभी
केंद्र तक
पर, पूरी किताब टिकी होती है
उन्हीं पर बहुत बार
कोशिश की
चुप्पी को पढ़ने की
लेकिन वह हर बार
अधिक जानकार निकली
जो नहीं गया लिखा
सबसे अधिक वही
लिखता रहा हमें
भाषा में।
3.शब्द और श्वास
जन्मता है शब्द
तो उसे जाने क्या क्या
सहना, करना और होना पड़ता है
पहले बनता है हवा
फिर ध्वनि
और अंत में
स्मृति
हम सोचते हैं?
हम बोलते हैं?
नहीं, वहम है हमारा
दरअसल
शब्द हममें बोलते हैं
और हम बढ़ते हैं
अर्थ की ओर
धीरे-धीरे
जैसे कोई नदी
खोज रही हो अपना
सागर
मिल जाना है उसे जिसमें।
4.अदृश्य हाथ
कभी कभी जान पड़ता है
कि कलम को हम नहीं
किसी और की उंगलियां रही है चला
मैं बस काग़ज़ को थामे हूँ
शब्द और रेखाएं
आते हैं कहीं से
और उतरते हैं यहीं पर
जैसे बादल
लिख रहे हों धरती की इच्छा
हर पंक्ति के बाद
मैं थोड़ा कम रह जाता हूँ ।
5.अभी भी संभव
अभी भी
शून्य में समाया है
पूरा संसार
एक शब्द
बदल सकता है दिशा
और
एक विराम बदल सकता है
पूरा जीवन अभी भी
यदि सुन सको
तो सुनो
सांस कागज की
जो लेता है जन्म
तुम्हारी प्रतीक्षा में
सुनो!वह शांत तो है
पर, जाग्रत भी है
इसे भूलना मत
याद रखना।